स्मृति इरानी बनाम राहुल गांधी: अमेठी की जंग में बीजेपी ने कैसे पलटी बाज़ी?

पिपली जमालपुर में गोमती पर बांध

लगभग डेढ़ किलोमीटर लंबे एक बांध ने अमेठी में बहुत कुछ बदल दिया.

गोमती नदी के बांध वाले किनारे पर ही है पिपली जमालपुर, वही गांव जो थौरी चौराहे से नदी को जानेवाली पतली सड़क पर मौजूद है. अरे, साइकिल मिस्त्री बलिकरण का गांव.

“नदी का पानी घर में घुस जाता था, हम सब इस क़दर परेशान हो गए थे कि गांव के लोगों ने पिछले चुनाव का बहिष्कार कर दिया, फिर स्मृति इरानी जी आईं और कहा कि आप लोग चुनाव का बहिष्कार न करें, मैं चाहे जीतूं या हारूं मैं बांध ज़रूर बनवाऊंगी”, पावों से लाचार बलिकरण अपनी गुमटी में बैठे कहते हैं.

ये बात 2014 की है, बलिकरण कहते हैं, लेकिन जब 2019 लोकसभा चुनाव हुआ तो पिपली जमालपुर और पास के 28 गांवों ने खुलकर स्मृति इरानी को वोट दिया.

हाल में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को तक़रीबन 55 हज़ार वोटों से शिकस्त देनेवाली स्मृति इरानी से जुड़े ऐसे कई क़िस्से काफ़ी ज़बानों से सुनने को मिलते हैं और हां, लोग उन्हें ‘दीदी’ बुला रहे हैं.

स्मृति इरानी

‘दीदी हैं तो मुमकिन है’

भारतीय जनता पार्टी के ज़िला कार्यालय में एक नारा जगह-जगह चिपका है: दीदी हैं तो मुमकिन है.

ज़िला कार्यालय में ही अध्यक्ष के कमरे के भीतर है – वार रूम – सीसीटीवी और चार-पांच डेस्क टॉप कंप्यूटर्स से लैस एक छोटा सा कमरा, जहां कंप्यूटर इंजीनियर विवेक माहेश्वरी की टीम बैठती है.

“हमलोगों का काम था अपनी बातों को दूर तक पहुंचाना. ज़िले के हर ब्लॉक में हमारी टीम थी. चीज़ें व्हाटसऐप पर फॉरवर्ड की जाती थीं. अमेठी ट्वीटर पर भी बहुत सक्रिय है. प्लस फ़ेसबुक, आप कुछ कर रहे हैं उसका लाइव करना, ग्रामीण जनता का जो जुड़ाव है न वो फ़ेसबुक पर ज़्यादा है,” छोटे क़द के विवेक बताते हैं.

पिपली बांध के वाक़्ये के साथ और भी नई कहानियां जुड़ती गईं, और उस अमेठी, जहां एक बार वोट मांगने के बाद कांशी राम से लेकर शरद यादव, और राजमोहन गांधी से लेकर कुमार विश्वास तक दुबारा नहीं गए थे इरानी बार-बार जातीं और डेरा लगाती रहीं.

अमेठी
Image captionनेहरू-गांधी परिवार से सबसे पहले अमेठी से संजय गांधी ने 1977 में चुनाव लड़ा था और हार गए थे

राहुल से शिकायत

अमेठी वालों को राहुल गांधी से, जो वहां से तीन बार सांसद रह चुके थे, यही सबसे बड़ी शिकायत है.

सैयद मोइन शाह कहते हैं, “उ आते भी थे तो दो तीन ही उनके मुक़ाम थे, जायस, जगदीशपुर, उनका अपना गेस्ट हाउस और ल चले गए. त इन तीन-चार जगह आने से बात न बनती. किसी को अपनी बात बताना हो तो कैसे बताये?”

हालांकि गांधी परिवार के प्रतिनिधि क्षेत्र में मौजूद रहते थे लेकिन लोगों की शिकायत है कि उनसे मिल पाना आसान न था.

मोइन शाह रामनगर में रहते हैं, अमेठी राजघराने के पुराने महल के पास, जो अब बंद पड़ा है.

कहते हैं कि अमेठी के राजा रणंजय सिंह ने ही संजय गांधी को अमेठी से लड़ाने का सुझाव दिया था. हालांकि संजय गांधी 1977 का चुनाव आपातकाल के बाद की इंदिरा विरोधी लहर में हार गए, लेकिन उन्हें लाख से ज़्यादा वोट हासिल हुए थे.

रामनगर से चंद किलोमीटर दूर मुसाफ़िरखाना को जानेवाले रास्ते के किनारे रामवृक्ष मोची की दुकान है, वो कहते हैं, “जैसे स्मृति इरानी प्रचार करत रहीं वोट मांगत रहीं गांव-गांव, वैसे इन्हों को चाहत रहा. जनता तरस रही थी देखने को त कम से कम देखती तो. अब आवत जरूर रहिंए लेकिन आवैं और रोड से ऐसे निकल जावें. रोड से आवैं रोड से चला जाएं.”

कांग्रेसी शीतला प्रसाद यादव भी थे रामवृक्ष की दुकान के पास और उन्होंने इस बार भी वोट कांग्रेस को दिया, लेकिन वो अपनी लीडरशिप से बहुत दुखी हैं. कहते हैं, “कार्यकर्ताओं की कोई पूछ ही नहीं है.”

कांग्रेस के योगेंद्र मिश्र इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं और बताते हैं कि राहुल गांधी बराबर आते थे और लोगों से मिलने के लिए अलग से समय रखा जाता था. साथ अगर कोई किसी काम के लिए कहता था तो उसे बाज़ाब्ता नोट किया जाता था.

मक़बरा मलिक मोहम्मद जायसी का मक़बरा
Image captionपदमावती नाम के महाकाव्य के रचयिता मलिक मोहम्मद जायसी का मक़बरा अमेठी में ही है

राहुल को लेकर घूमते नैरेटिव

रामनगर की मुख्य सड़क से बायें को मुड़ने पर हरे और सफ़ेद रंगों से पुता ख़ासे बड़े अहाते में फैला मलिक मोहम्मद जायसी का मक़बरा है, उनका जन्मस्थान जायस भी यहां से कुछ ही किलोमीटर दूर है. जायसी ने 16वीं सदी में पदमावती नाम के महाकाव्य की रचना की थी. कहते हैं ये एक काल्पनिक कहानी पर आधारित थी. लेकिन कुछ लोग इसे सच मान रहे हैं और फ़िल्म पदमावती या पदमावत पर मचा हंगामा लोगों को याद है.

शहर की सड़कों पर राहुल गांधी को लेकर भी कई कहानियां कही जा रहीं हैं. टुकड़े-टुकड़े गैंग के दोस्त होने के साथ-साथ उन्हें सेना के शौर्य पर सवाल उठाने वाला भी बताया जा रहा है.

गौरीगंज बाज़ार के पास हो रही बातचीत में जब मैंने लोगों से कहा कि कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद और दूसरे, जिन्हें टुकड़े-टुकड़े गैंग बताया जा रहा है, के ख़िलाफ़ पुलिस ने तक़रीबन तीन साल तक किसी तरह की चार्जशीट तक दाख़िल नहीं की, तो कई लोग एक साथ कह उठते हैं, जी नहीं देश ने फ़ैसला कर लिया है कि वो लोग भारत के टुकड़े-टुकड़े देखना चाहते हैं.

वहीं, साध्वी प्रज्ञा के ख़िलाफ़ अदालत में जारी मालेगांव ब्लास्ट मुक़दमे को लोग यहां भी साज़िश और हिंदुओं को बदनाम किए जाने की चाल बताते हैं.

इस सवाल पर कि कांग्रेस इस तरह के नरैटिव को क्यों काउंटर नहीं कर पाई, ज़िला पार्टी प्रवक्ता अनिल सिंह कहते हैं, वो नेहरू को गाली देते हैं, इंदिरा को गाली देते हैं हम किसको बुरा-भला कहें उनके हीरो नाथूराम गोडसे को!

कहा ये भी जा रहा है कि 10 सालों तक केंद्र में कांग्रेस सरकार रहने के बावजूद राहुल गांधी ने अमेठी के लिए कुछ नहीं किया और जो भी काम दिख रहा है चाहे अस्पताल, या बीएचईएल, एचएएल, एसीसी या संजय गांधी अस्पताल वो राजीव गांधी के वक़्त का है.

ये वाक्य सुनते ही एक व्यक्ति बिगड़कर कहने लगते हैं, “हां, हां स्मृति जी ने तो बहुत काम किया है, वो ट्रिपल आईटी यहां से ले गईं. गत्ता कारख़ाना था जिसे उन्होंने यहां से कहीं बाहर भिजवा दिया.”

योगेंद्र मिश्र दावा करते हैं कि केंद्र में बीजेपी सरकार के बनने के बाद से ही अमेठी को टारगेट किया गया और बेपनाह पैसे खर्च किए गए चुनाव में.

बीजेपी प्रवक्ता गोविंद सिंह चौहान इसे झूठ बताते हैं और कहते हैं कि ये मोदी मैजिक और स्मृति इरानी की मेहनत का नतीजा है.

कांग्रेस दफ़्तर अमेठी

कांग्रेस का ओवर कॉन्फिडेंस

डाक्टर अंगद सिंह स्थानीय कालेज में शिक्षक रहे हैं उनके मुताबिक़ कांग्रेस में ज़रूरत से अधिक आत्मविश्वास था जिसका नतीजा सामने है.

अंगद सिंह के मुताबिक़ राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव लड़ने का बड़ा नेगेटिव मैसेज गया क्योंकि अमेठी की जनता को लगा कि वो यहां के लोगों पर भरोसा नहीं करते हैं.

अमेठी में 2014 लोकसभा चुनाव में ही विजयी राहुल गांधी और स्मृति इरानी की हार-जीत का फ़ासला कम होकर लाख से कुछ ऊपर तक पहुंच गया था. 2017 विधानसभा में पांच की पांच सीटें बीजेपी और सपा के खाते चली गई थीं.

राष्ट्रवाद और बलशाली लीडर मोदी का जादू अमेठी वालों के सर भी सर चढ़कर बोल रहा था. रही-सही कमी पूरी कर दी इस बार उन अनसुने दलों और आज़ाद उन 25 उम्मीदवारों ने जिन्हें तक़रीबन साठ हज़ार वोट हासिल हुए.

अमेठी में राहुल गांधी की हार 55 हज़ार 120 मतों से हुई.

 
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