इसराइल: बिन्यामिन नेतन्याहू का जादू अब फीका पड़ रहा है?

बिन्यामिन नेतन्याहू

“हम एक स्पष्ट चुनाव अभियान चलाएंगे जो हमें जीत दिलाएगा. हम जीतेंगे और जनता जीतेगी.”

इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू बीती 29 मई को ये एलान करने के पहले ही तय कर चुके थे कि अप्रैल में चुने गए सांसद नए चुनाव का रास्ता तैयार कर दें.

संसद भंग करने के प्रस्ताव का 74 सांसदों ने समर्थन किया और 45 ने इसका विरोध किया.

इसके करीब छह हफ़्ते पहले यानी 9 अप्रैल को नेतन्याहू का अंदाज़ अलग था.

उनकी लिकुड पार्टी ने चुनाव में 120 में से सिर्फ़ 35 सीटें जीती थीं लेकिन अपने गठबंधन के भरोसे वो जीत का दावा कर रहे थे.

चुनाव के पोस्टर के सामने गुजरता एक व्यक्ति

क्यों नहीं चला जादू?

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप समेत दुनिया भर के ऐसे नेता जिनके साथ इसराइल मित्रता का दम भरता है, वो नेतन्याहू को जीत की बधाई दे रहे थे.

मीडिया में उनके रिकॉर्ड पांचवीं बार इसराइल का प्रधानमंत्री बनने की चर्चा थी. समर्थकों के बीच बीबी नाम से चर्चित नेतन्याहू को जादूगर बताने की होड़ थी.

इसराइल में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्रा कहते हैं कि आगे की कहानी नेतन्याहू और उनकी पार्टी की स्क्रिप्ट के मुताबिक नहीं बढ़ी.

मिश्रा बताते हैं, “चुनाव परिणाम आये तो यहां कहा जाने लगा कि नेतन्याहू वाकई चुनाव के जादूगर हैं. चुनावी रणनीति में इन्हें कोई पीछे नहीं छोड़ सकता. चुनाव में दक्षिणपंथी पार्टियों के समूह को 65 सीटें मिलीं और 65 सांसदों ने इनके समर्थन में पत्र भी दे दिया. लेकिन किसी ने ऐसी उम्मीद नहीं की थी कि ऐसी भी परिस्थितियां बनेंगी कि ये सरकार का गठन नहीं कर पाएंगे.”

इसराइल की संसद

पहली बार साल में दोबार चुनाव

इतिहास है कि 120 सदस्यीय इसराइल की संसद में कभी किसी दल को बहुमत नहीं मिला है. गठबंधन सरकारें देश की नियति बन चुकी हैं लेकिन सरकार बनाने का मौका मिलने के बाद कोई नेता गठबंधन तैयार करने में विफल रहा हो ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था.

दस साल पहले यानी साल 2009 में नेतन्याहू जब दूसरी बार इसराइल के प्रधानमंत्री बने थे तब वहां भारत के राजदूत नवतेज सिंह सरना थे. उनका आकलन है कि नेतन्याहू का जादू उतार पर है.

सरना कहते हैं, “नेतन्याहू ने ये सोचा कि विपक्ष को सरकार बनाने का मौका नहीं मिल सके तो उन्होंने दोबारा चुनाव कराने का फैसला किया. साल 1948 के बाद ये पहली बार हो रहा है कि सरकार नहीं बन पाई और दोबारा चुनाव कराने पड़ रहे हों. ये तो पक्का लग ही रहा है कि (नेतन्याहू का) मैजिक कम हो गया.

नेतन्याहू पहली बार साल 1996 में प्रधानमंत्री बने थे लेकिन इसराइल की राजनीति में असल धमक उन्होंने साल 2009 में दोबारा पीएम बनने के बाद दिखाई.

बेनी गैंट्ज़ और नेतन्याहू
इसराइल में अप्रैल में हुए चुनाव में बेनी गैंट्ज ने प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के सामने कड़ी चुनौती पेश की.

पूर्व जनरल ने दी कड़ी चुनौती

कभी कमांडो रहे नेतन्याहू ने अपनी छवि एक ऐसे नेता की गढ़ी जो इसराइल के हितों की रक्षा की गारंटी देता है.

भूमध्यसागर के पूर्वी किनारे पर बसा इसराइल दुनिया का इकलौता देश है जहां यहूदी बहुसंख्यक हैं.

फ़लस्तीनी क्षेत्र और ईरान के साथ इसराइल का तनाव अक्सर दुनिया का ध्यान खींचता है. दूसरे अरब देशों के साथ भी उसके रिश्तों के समीकरण बदलते रहे हैं.

बीते एक दशक में नेतन्याहू ने देश की चुनौतियों को अपने दक्षिणपंथी गठबंधन के हक़ में बखूबी इस्तेमाल किया है.

फलस्तीन को लेकर उनका रुख सख्त रहा है. सुरक्षा उनकी आला प्राथमिकता रही है.

लेकिन 2019 की चुनावी लड़ाई उनके लिए आसान नहीं थी. नई राजनीतिक ताकत बनकर उभरे पूर्व जनरल बेनी गैंट्ज़ ने उन्हें कड़ी चुनौती दी. उनको सुरक्षा के मुद्दों पर घेरा.

इसराइल के पूर्व रक्षामंत्री लीबरमैन
इसराइल में प्रधानमंत्री नेतन्याहू के सहयोगी रहे लीबरमैन ने साल 2013 में रक्षा मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

सहयोगी ने दिया झटका

नेतन्याहू पर लगते भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी विरोधियों के हमलों को धार दी और जब वो गठबंधन बनाने में नाकाम रहे तो विश्लेषकों को लगा कि विरोधियों ने नेतन्याहू की कमजोर नसों को पहचान लिया है.

नवतेज सिंह सरना कहते हैं, “उन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं. और ये भी माना जाता है कि अगर वो सरकार में आते तो वो एक ऐसा कानून बनाने की कोशिश करते जिससे पद पर रहने के दौरान इन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सके.”

ऐसी कोशिशों का लोगों ने सड़क पर उतरकर विरोध किया. लेकिन नेतन्याहू की असल दिक्कतें पूर्व रक्षामंत्री एविगडोर लीबरमैन ने बढ़ाईं. लीबरमैन एक ऐसे विधेयक के समर्थन की बात कर रहे थे, जो पास होता तो रूढिवादी युवाओं को सेना में काम करना होता. गठबंधन के बाकी सहयोगी धार्मिक वजहों से इसके विरोध में थे.

हरेंद्र मिश्रा की राय है कि लीबरमैन के अड़े रहने का प्रत्यक्ष मक़सद चाहे विधेयक रहा हो लेकिन असल मुद्दा कुछ और था.

मिश्रा कहते हैं, “लीबरमैन नेतन्याहू के करीबी सलाहकार रह चुके हैं. इन दोनों ने साथ काम किया है. इनका 31 साल का निजी संबंध है. लेकिन ये भी माना जा रहा है कि अंदर ही अंदर दोनों के बीच गहरे मतभेद हैं. इसलिए लीबरमैन लगातार मौके की तलाश में थे कि कैसे नेतन्याहू को नीचे गिरा दें और ये इसी का परिणाम है.”

नेतन्याहू और लीबरमैन

इसराइल चुका रहा है बड़ी कीमत

नेतन्याहू गठबंधन बनाने में नाकाम रहे लेकिन वो परिस्थितियों से बेखबर नहीं थे. इसराइल के राष्ट्रपति रूबेन रिवलिन किसी अन्य नेता को सरकार बनाने की कोशिश करने के लिए चुनते, उसके पहले ही उन्होंने दोबारा चुनाव का दांव चल दिया और कुर्सी पर बने रहे.

नेतन्याहू जुलाई में इसराइल के पहले नेता डेविड बेन गुरियां के सबसे ज्यादा वक़्त तक शीर्ष पर रहने का रिकॉर्ड तोड़ देंगे लेकिन सितंबर में होने वाले चुनाव में उनकी राह आसान नहीं होंगी. हरेंद्र मिश्रा की राय है कि हालिया सर्वे सितंबर के चुनाव में भी ऐसे ही नतीजे आने के संकेत दे रहे हैं और अगर चुनाव के बाद नेतन्याहू एक बार फिर गठबंधन नहीं बना सके तो उनकी मुश्किलें बढ़ेंगी.

हरेंद्र मिश्रा कहते हैं, “कई लोगों का ये मानना है कि देश नेतन्याहू को प्रधानमंत्री बनाए रखने के लिए बहुत बड़ी कीमत चुका रहा है. यहां कहा जा रहा है कि अगले चुनाव में 500 मिलियन शेकेल खर्च आएगा और ये बहुत बड़ी रकम है. अर्थव्यवस्था पर इसका बहुत बुरा असर पड़ेगा. देश तीसरे चुनाव के लिए तैयार नहीं होगा.”

नेतन्याहू भी इन चुनौतियों से वाकिफ हैं. इसलिए उन्होंने सरकार गठन की कोशिश के दौरान विपक्षी खेमे को भी साथ लेने की कोशिश की थी. हरेंद्र मिश्रा के मुताबिक गैंट्ज़ की पार्टी यूनिटी सरकार गठन के लिए तैयार होने का संकेत भी दे रही थी लेकिन उसे नेता के तौर पर नेतन्याहू मंजूर नहीं थे.

नेतन्याहू को सरकार गठन के लिए 61 सांसदों का समर्थन चाहिए था और लीबरमैन का समर्थन नहीं मिलने से उनके पास सिर्फ़ एक सांसद की कमी रह गई.

नेतन्याहू

दांव पर साख

लीबरमैन को उम्मीद है कि सितंबर में होने वाले चुनाव में उनकी ताक़त बढ़ेगी. लेकिन विश्लेषकों का दावा है कि नेतन्याहू आसानी से मैदान नहीं छोड़ेंगे.

नवतेज सिंह सरना कहते हैं, “चुनाव के बारे में तो कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन इतना जरूर है कि बिन्यामिन नेतन्याहू एक अनुभवी और माने हुए राजनीतिक खिलाड़ी हैं. ये पूरे दम से चुनाव लड़ेंगे. रणनीति में ये कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.”

नवतेज सिंह सरना की ही तरह हरेंद्र मिश्र भी मानते हैं कि बीते एक दशक से अंतरराष्ट्रीय मंच पर इसराइल की पहचान के पर्याय बने नेतन्याहू अपनी छवि के सहारे चुनाव लड़ेंगे.

वो कहते हैं, “पूरी दुनिया में जितने बड़े नेता हैं, उनसे नेतन्याहू की अच्छी मित्रता है. वो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी बार-बार जिक्र करते हैं. उनके वोटर ये कहते हैं कि नेतन्याहू की वजह से इसराइल की विश्व में साख जमी है. इसराइल के सुरक्षा हितों की रखवाली करने में भी वो कामयाब रहे हैं. ये बात उनके पक्ष में हमेशा जाती रही है.” 

नेतन्याहू

बदलाव की राह पर इसराइल?

इसराइल की राजनीति पर नज़र रखने वाले दावा करते हैं कि फिसलते ताज को बचाने के लिए वो चुनाव में तमाम ऐसे मुद्दे उठाएंगे जो देश के लिए सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं.

सरना की राय है, “अभी नेतन्याहू प्रधानमंत्री के पद पर हैं, उनके हाथ में बहुत कुछ होगा. वो ज्यादा से ज्यादा वोट लेने की कोशिश करेंगे. चुनाव में कई तरह के क्षेत्रीय मुद्दे सामने आएंगे. इनमें अमरीका और ईरान के रिश्ते की बात भी होगी. अमरीका ने इसराइल और फलस्तीन की शांति वार्ता के लिए जो योजना तैयार की है उसकी भी बात होगी. नेतन्याहू कई योजनाओं का सकारात्मक प्रभाव अपनी तरफ बनाने की कोशिश करेंगे. मेरा ख्याल है कि सितंबर में जो चुनाव होगा ये भी बहुत करीबी चुनाव होगा.”

इसराइल में बदलाव के हामी और नेतन्याहू के विरोधी भी मुक़ाबले को करीबी बनाना चाहते हैं. वजह ये है कि वो जानते हैं कि इसराइल का नेता वो शख्स नहीं बनता जिसे सबसे ज़्यादा वोट मिलते हैं. बल्कि कुर्सी पर काबिज वो होता है जो 61 सांसदों का समर्थन जुटा लेता है.

और नेतन्याहू मई में ऐसा करने में नाकाम हो चुके हैं. विरोधियों को यहीं से बदलाव की नई राह दिखाई देती है.