एडवेंचर से भरपूर चकराता आकर कम बजट में भी कर सकते हैं 2 से 3 दिन जमकर मस्ती

एडवेंचर से भरपूर चकराता आकर कम बजट में भी कर सकते हैं 2 से 3 दिन जमकर मस्ती

इस भीषण गर्मी में शांत और प्रदूषणमुक्त माहौल और अनछुए प्राकृतिक सौंदर्य वाले स्थान की तलाश में हैं तो देहरादून के करीब स्थित चकराता और जौनसार-बावर पहली में भा जाएंगे।

यह एक छोटे और सुंदर पहाड़ी नगर के रूप में नजर आता है। रोजमर्रा की जिंदगी और महानगरों के शोर से दूर कुछ पल शांति से बिताने वालों के लिए यह ठिकाना खास है। वैसे, यदि आप कुदरती खूबसूरती के साथ-साथ कुछ रोमांचक खेलों के लिए भी ऐसी किसी जगह की तलाश में हैं तो जौनसार बावर का यह इलाका यानी चकराता माकूल लगेगा। कैंपिंग करनी हो या राफ्टिंग या फिर ट्रेकिंग, यहां हर चीज की सुविधा मिलेगी। रैपलिंग, रॉक क्लाइंबिंग का विचार हो, तो इनके लिए भी परफेक्ट जगह है यह। आनंद का फुल पैकेज मिलता है यहां। इस जगह पर ऐतिहासिक, पुरातात्विक, सामाजिक और सांस्कृतिक वैभव बिखरा हुआ है। यहां आते ही आप कह उठेंगे कि यही तो है हमारे ख्वाबों की दुनिया!

जौनसार-बावर के पारंपरिक घर

यमुना, टोंस व पावर नदी के बीच बसे जौनसार-बावर का इलाका 463 वर्ग मील में फैला हुआ है। जमना (यमुना) नदी के पार होने के कारण यह क्षेत्र जमना पार का इलाका कहलाता है जो बाद में जौनसार नाम से प्रचलित हो गया। उत्तर दिशा वाले क्षेत्र को पावर नदी के कारण बावर कहा जाने लगा। इसके पूर्व में यमुना नदी, उत्तर दिशा में उत्तरकाशी व हिमाचल का कुछ क्षेत्र, पश्चिम में टोंस नदी और दक्षिण में पछवादून-विकासनगर क्षेत्र पड़ता है और इसी क्षेत्र में बसा है चकराता नामक छावनी क्षेत्र भी। जौनसार-बावर आएं तो आपको यहां के पारंपरिक मकान चकित करेंगे, जो कि आम मकानों से बेहद अलग होते हैं। पत्थर और लकड़ी से बने ये मकान पगोड़ा शैली में बने हैं। इन मकानों की ढलावदार छत पहाड़ी स्लेटी पत्थर की बनी होती हैं। दो, तीन या चार मंजिल वाले इन मकानों की हर मंजिल पर एक से चार कमरे बने होते हैं। सर्दी में ये मकान सर्द नहीं होते हैं। एक और खास बात। इन मकानों के निर्माण में ज्यादातर देवदार की लकड़ी का इस्तेमाल होता है। उस पर की गई महीन नक्काशी देखते ही बनती है।

ट्रैकिंग, रेफलिंग के लिए खास

ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए जौनसार-बावर की खूबसूरत वादियां खास तौर पर अनुकूल हैं। स्थानीय निवासी नेशनल शूटर पंकज चौहान कहते हैं, जब सीजन अनुकूल रहता है तो यहां पर्यटकों की भीड़ लग जाती है। साहसिक पर्यटन के लिहाज से चकराता की पहाडियां ट्रेकिंग व रेपलिंग के शौकीनों के लिए मुफीद मानी जाती हैं। यहां पर्यटकों को चकराता के पास मुंडाली, बुधेर, मोइला टॉप, खंडबा, किमोला फॉल और आसपास की चोटियों पर ट्रेकिंग व रेपलिंग कराई जाती है। स्थानीय लोखंडी होटल संचालित करने वाले रोहन राणा बताते हैं, बुधेर के पास गुफा व छोटी-बड़ी चोटियों की श्रृंखला है। गर्मियों में यहां ट्रैकिंग के लिए विभिन्न शहरों व महानगरों से सैलानी पहुंचते हैं। यहां पर्यटकों को ट्रेकिंग, रेफलिंग कराने के लिए प्रशिक्षित युवा रखे गए हैं।

यादों का खूबसूरत घर

समुद्र तल से करीब सात हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित चकराता को अंग्रेजों ने छावनी क्षेत्र के रूप में बसाया था। 55वीं सिरमौर रेजीमेंट के कर्नल एच.रॉबर्ट ह्यूम ने वर्ष 1869 में चकराता छावनी की स्थापना की। इससे पूर्व वर्ष 1815 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने जौनसार-बावर को अपने अधीन ले लिया था। इस दौरान मसूरी से चकराता की पहाडिय़ों से होकर शिमला तक पैदल मार्ग बनाया गया। वर्ष 1927 में चकराता कैलाना छावनी में जिम्नेजियम सिनेमा की दो शाखाएं थीं, जहां केवल गर्मियों में ही सिनेमा दिखाया जाता था। इसके अवशेष आज भी हैं जो इस क्षेत्र को खूबसूरत यादों का घर बनाते हैं। यहां पुराने दौर के बने हुए रोमन कैथोलिक व स्कॉटिश चर्च भी हैं जो यहां आने वालों को बीते समय की कहानी सुनाते नजर आते हैं।

1957 में चकराता आए थे पं. नेहरू

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने वर्ष 1957 में चकराता क्षेत्र का दौरा किया था। चकराता सीट से आठ बार विधायक एवं तीन बार उत्तर प्रदेश सरकार में पर्वतीय विकास राज्यमंत्री रहे गुलाब सिंह नेहरू जी को चकराता लाए थे। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जौनसार-बावर क्षेत्र की अलग बोली-भाषा, पहनावा, रीति-रिवाज, अनूठी संस्कृति व परपंरा के मद्देनजर वर्ष 1967 में इसे जनजातीय क्षेत्र घोषित किया था।

विदेशी पर्यटकों पर रोक! सामारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चकराता छावनी क्षेत्र चीन व नेपाल सीमा के नजदीक पड़ता है, इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से यहां विदेशी पर्यटकों की आवाजाही पर रोक है। दरअसल, यहां घूमने के लिए उन्हें चकराता छावनी के कमांडेंट से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है।

गुफाओं वाला बुधेर

चकराता के समीप 2800 मीटर (9184 फीट) की ऊंचाई पर स्थित मखमली घास का मैदान बुधेर (मोइला दंडा) कहलाता है। बुधेर एशिया के बेहतरीन जंगलों में एक है। यहां चूना पत्थर की प्रचुरता की वजह से कई छोटी-बड़ी गुफाएं हैं। यहां पर्यटकों के ठहरने के लिए देवदार वन के बीच अंग्रेजों के दौर में बना चकराता वन प्रभाग का वन विश्राम गृह मौजूद है।

मुंडाली व खडंबा है सबसे पसंदीदा

चकराता के समीप ही लगभग दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित मुंडाली व खडंबा की पहाडिय़ां ट्रैकिंग के लिए पर्यटकों की सबसे पंसदीदा जगहें हैं। यहां आसपास बने लोक देवों के मंदिर भी आकर्षण के केंद्र हैं।

आसपास घूमने वाली दूसरी बेहतरीन जगहें

देववन से हिमालय का खूबसूरत नजारा

चकराता के पास देववन की ऊंची चोटी से हिमालय का मनमोहक नजारा भावविभोर कर देता है। देववन में वन विभाग के अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है। देववन व कनासर में वन विभाग के अधिकारियों का ट्रेनिंग कैंप है। यहां आइएफएस अधिकारी ट्रेनिंग के लिए आते हैं।

चिरमिरी से सूर्यास्त का नजारा

चकराता से चार किमी. दूर चिरमिरी नामक जगह से शाम के वक्त सूर्यास्त का खूबसूरत नजारा दिखाई पड़ता है। चकराता की सैर पर आए पर्यटक सूर्यास्त के समय चिरमिरी जाकर प्रकृति को करीब से निहारने का सुख पाते हैं।

चिंताहरण महादेव मंदिर

चकराता के पास चिंताहरण महादेव मंदिर आकर्षित करता है। वर्ष 1933 में छावनी बाजार चकराता में कारोबार करने आए श्याम सुंदर गोयल ने चिंताहरण महादेव मंदिर की खोज कर इसका पुनर्निर्माण कराया था। यहां बड़ी संख्या में लोग भगवान भोलेनाथ के दर्शनों को पहुंचते हैं।

शेर की दहाड़ जैसी गर्जना करता झरना

टाइगर फॉल (1395 मीटर) छावनी बाजार चकराता से 17 किमी. दूर लाखामंडल मार्ग पर स्थित है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी शेर की दहाड़ जैसी आवाज है। अगर आप यहां से गुजरते हैं तो इसकी आवाज आपको अपनी ओर खींच लाएगी। हालांकि शेर सी दहाड़ मारते इस झरने का आसपास का नजारा बेहतरीन है। एक बार यहां आएं और देर तक ठहरकर ढेर सारी ऊर्जा लेकर वापस जाएं।

कोटी-कनासर का सुंदर बुग्याल 

मसूरी-चकराता-त्यूणी हाइवे पर चकराता से 31 किमी. दूर कोटी-कनासर बुग्याल (मखमली घास का मैदान) पड़ता है। समुद्र तल से 8500 फीट की ऊंचाई पर देवदार के जंगलों से घिरे बुग्याल को देखना अचरजभरा है। यहां देवदार के 600 वर्ष पुराने वृक्ष आज भी मौजूद हैं। आप तकरीबन 6.5 फीट की गोलाई वाले इन वृक्षों को देखकर यहां के वन संपदा पर गर्व करने लगेंगे।

लाखामंडल का आकर्षण

चकराता से 62 किमी. दूर समुद्र तल से 1372 मीटर (4500 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है लाखामंडल। कहते हैं कि कौरवों ने पांडवों व उनकी माता कुंती को जीवित जलाने के लिए यहां लाक्षागृह (लाख का घर) का निर्माण कराया था। इसके कई प्रमाण लाखामंडल में खुदाई के दौरान मिले हैं। यहां सवा लाख शिवलिंगों का संग्रह है। यमुना नदी के किनारे बसे लाखामंडल के प्राचीन शिव मंदिर की ऊंचाई 18.5 फीट है। छत्र शैली में बने लाखामंडल के शिव मंदिर का निर्माण सिंहपुर के यादव राजवंश की राजकुमारी ईश्र्वरा ने अपने पति जालंधर के राजा चंद्रगुप्त की स्मृति में करवाया था। मंदिर बड़े शिलाखंडों से निर्मित है। यहां मिले शिलालेख में ब्राह्मी लिपि व संस्कृत भाषा का उल्लेख है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने लाखामंडल की यात्रा की थी। इस मंदिर को आठवीं सदी का बताया जाता है, जबकि स्थानीय लोग इसे पांडवकालीन बताते हैं।

त्रिवेणी तीर्थ है लाखामंडल

प्राचीनकाल लाखामंडल क्षेत्र बंदरगढ़ कहलाता था। यहां लाक्षेश्र्वर मंदिर होने से इसका नाम लाखामंडल पड़ा। लाखामंडल में प्राचीन सभ्यताएं विद्यमान हैं। यमुना नदी के किनारे बसे इस स्थल को त्रिवेणी तीर्थ भी कहा जाता है। यहां यमुना, ऋषिगंगा, रिखनाव गाड, बाणगंगा, गंगाणी पाणी नाम की पांच जलधाराओं का संगम होता है।

चार जिलों का केंद्र त्यूणी बाजार

जौनसार-बावर का सीमांत त्यूणी कस्बा उत्तराखंड के देहरादून व उत्तरकाशी जिलों के साथ हिमाचल प्रदेश के शिमला व सिरमौर जिलों का केंद्र बिंदु है। समुद्र तल से एक हजार मीटर की ऊंचाई पर बसे त्यूणी बाजार आने-जाने के लिए दो हाइवे समेत चार मोटर मार्ग हैं। पर्यटकों के ठहरने के लिए यहां लोक निर्माण विभाग व वन विभाग के दो बंगले और होटल बने हुए हैं। यहां से सिद्धपीठ श्री महासू देवता मंदिर हनोल 15 किमी. की दूरी पर है, जबकि शिमला की दूरी 90 किमी. है।

हनोल में विराजते महासू महाराज

पांडवकालीन सिद्धपीठ श्री महासू देवता का मंदिर हनोल गांव में स्थित है। महासू जौनसार-बावर व हिमाचल प्रदेश के शिमला व सिरमौर जिले के आराध्य देव हैं। नागर शैली में बने महासू मंदिर, हनोल की भव्यता देखते ही बनती है। समुद्र तल से 1200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हनोल मंदिर की मान्यता देशभर में है। यहां देश-विदेश के पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है। देहरादून से मसूरी-पुरोला, विकासनगर-चकराता या हरिपुर-मीनस होते हुए हनोल पहुंचा जा सकता है।

अनूठी है चीड़ महावृक्ष की समाधि!

हनोल से पांच किमी. दूर त्यूणी-पुरोला राजमार्ग पर स्थित खूनीगाड में एशिया महाद्वीप के सबसे ऊंचे चीड़ महावृक्ष की समाधि है। चीड़ महावृक्ष के धराशायी होने के बाद टोंस वन प्रभाग की ओर से इसकी सभी डाटें यहां सुरक्षित रखी गई हैं। इसके दीदार के लिए यहां देश-विदेश के पर्यटक संख्या में यहां पहुंचते हैं।

परंपराओं की स्वादिष्ट थाली

जौनसार-बावर और चकराता आएं तो आपको एक चीज जो सबसे खास लगेगी, वह है यहां की मेहमानवाजी। यहां घर आए मेहमानों को कांसे की थाली में खाना खिलाया जाता है। यहां आसपास खाने-पीने की बड़ी दुकानें नहीं हैं, जो भी हैं वहां से आप यहां के परपंरागत व्यंजन सीडे, अस्के का स्वाद ले सकते हैं। लाल चावल, मीट, कचौरी, राजमा व उड़द की दाल, लाल चावल की खिचड़ी, तिल-भंगजीरे की चटनी, पहाड़ी खीरे के सलाद जैसे व्यंजनों को आम खानपान में शामिल किया जाता है। जौनसारी महिलाएं बड़ी खुशमिजाज होती हैं और वे इन लजीज व्यंजनों को बनाने में कड़ी मेहनत करती हैं। अब यदि आपको कभी इस इलाके में घूमने का अवसर मिले तो आप खुद पाएंगे कि ऐसी मेहमाननवाजी और परंपराओं की स्वादिष्ट थाली दूसरी जगह बहुत कम देखने को मिलती है।

कैसे और कब पहुंचें?

देहरादून से चकराता की दूरी सड़क मार्ग से करीब 90 किमी. है। देहरादून से आप दो रास्तों मसूरी-नागथात और विकासनगर-कालसी होकर बस, टैक्सी व अन्य छोटे वाहनों से चकराता पहुंच सकते हैं। चकराता क्षेत्र में पेट्रोल पंप की सुविधा नहीं है, इसलिए प्राइवेट वाहन से आने वाले पर्यटक विकासनगर व कालसी में टैंक फुल कराकर ही यहां आएं। जॉली ग्रांट (देहरादून) चकराता से 113 किमी. की दूरी पर स्थित निकटतम हवाई अड्डा है। निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून रेलवे स्टेशन है। मार्च से जून और अक्टूबर से दिसंबर के बीच आप जौनसार-बावर की खूबसूरत वादियों का लुत्फ ले सकते हैं। जून के आखिर से सिंतबर के मध्य यहां बरसात होती है, जबकि सर्दियों में यहां जबर्दस्त ठंड पड़ती है।