यूपी में हार के लिए क्या प्रियंका-ज्योतिरादित्य की जिम्मेदारी भी तय करेंगे राहुल?


उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की यूथ कांग्रेस के नेताओं के साथ मुलाकात के दौरान की गई टिप्पणी के बाद सवाल उठने लगे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की करारी हार की जिम्मेदारी क्या पूर्वी यूपी की प्रभारी प्रियंका गांधी और पश्चिम यूपी के प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया को नहीं लेनी चाहिए?

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लोकसभा चुनावों में ‘मोदी की सुनामी’ ने कांग्रेस को तबाह कर दिया है. उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस की नैया पार लगाने उतरीं प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया पूरी तरह से फेल रहे. चुनाव में करारी हार के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है और अभी भी अपने फैसले पर अडिग हैं.

राहुल गांधी ने बुधवार को यूथ कांग्रेस के नेताओं से मुलाकात के दौरान कहा कि उन्हें इस बात का दुख है कि उनके पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिए जाने के बाद भी कांग्रेस शासित राज्यों के कुछ मुख्यमंत्रियों, महासचिवों, प्रभारियों और वरिष्ठ नेताओं को अपनी जवाबदेही का अहसास नहीं हुआ. राहुल की इस टिप्पणी के बाद सवाल उठने लगे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की करारी हार की जिम्मेदारी क्या प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया लेंगे.

दरअसल लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जमीनी स्तर पर मजबूती देने के लिए प्रियंका गांधी को महासचिव बनाया गया. साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी. जबकि पश्चिम यूपी का प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया को बनाया गया था. सूबे की 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस 67 सीटों पर चुनाव लड़ी. बाकी 13 में से कुछ सीटें ऐसी रहीं जहां पार्टी ने दूसरे को समर्थन किया था.

राहुल गांधी की अध्यक्षता में चुनाव में उतरी कांग्रेस राहुल के साथ ही प्रियंका और ज्योतिरादित्य सिंधिया के सहारे बेहतर परिणामों की उम्मीद कर रही थी. लेकिन आलम यह रहा कि दिग्गजों को हार का मुंह देखना पड़ा और राहुल गांधी परंपरागत सीट अमेठी तक को गंवा बैठे. यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने रायबरेली में जीत हासिल कर पार्टी का खाता खोला.

यूपी में कांग्रेस के केवल 4 प्रत्याशी ही अपनी जमानत बचा सके थे. सोनिया गांधी ने जहां रायबरेली से जीत हासिल की थी. वहीं, राहुल गांधी अमेठी, इमरान मसूद सहारनपुर और श्रीप्रकाश जायसवाल कानपुर से ऐसे उम्मीदवार रहे जो अपनी जमानत बचा सके थे. उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर, पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद, पूर्व केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद के अलावा निर्मल खत्री, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और अजय राय जैसे दिग्गज नेता भी अपनी जमानत बचाने में नाकाम रहे. 10 जगहों पर तो कांग्रेस प्रत्याशी ऐसे रहे, जिन्हें कुल पड़े वोटों का 2 प्रतिशत से भी कम हासिल हुआ.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की इतनी बुरी हालत आपातकाल के दौर में हुई थी, जब 1977 में पार्टी का सूबे में खाता तक नहीं खुला था. इस बार के लोकसभा चुनाव में भी नतीजे आपातकाल से कम नहीं थे. जब राहुल गांधी ने देश में पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है और अपने फैसले पर कायम हैं. ऐसे में उत्तर प्रदेश की हार की जिम्मेदारी क्या प्रियंका और सिंधिया को नहीं लेनी चाहिए?

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