अमरनाथ यात्रा: हिंदुओं की यह तीर्थ यात्रा मुस्लिमों की भागीदारी के बिना असंभव जैसी है


अमरनाथ गुफा तक पहुंचने के दो रास्ते हैं. यात्रा जम्मू-कश्मीर के पहलगाम मार्ग और बालटाल मार्ग से होती है. बालटाल मार्ग से गुफा की दूरी कम है. इस बार अमरनाथ यात्रा 15 अगस्त तक चलेगी.

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नई दिल्ली: हिमालय पर स्थित हिंदुओं के पवित्र तीर्थ स्थल अमरनाथ के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का जत्था रवाना हो चुका है. पूरा माहौल भक्तिमय है और हर तरफ बम भोले के जयकारे लग रहे हैं. यह यात्रा धार्मिक भाईचारे के प्रतीक की तरह भी है. जहां अक्सर पालकी पर शिव के भक्त होते हैं और पालकी वाला मुसलमान होता है. वहीं कई बार शिवभक्त बाबा के दर तक पहुंचने के लिए खच्चर से जाते हैं और इसे संभालने वाले भी मुसलमान होते हैं.

अमरनाथ गुफा कहां है और रास्ते क्या हैं?
पवित्र गुफा दक्षिण कश्मीर हिमालय में 3880 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. गुफा 160 फुट लंबी, 100 फुट चौड़ी और काफी ऊंची है. यात्रा जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के 36 किलोमीटर लंबे पारंपरिक पहलगाम मार्ग और गांदेरबल जिले के 14 किलोमीटर लंबे बालटाल मार्ग से होती है. पहलगाम से चंदनवारी, पिस्सु टॉप, शेषनाग, पंचतरणी होते हुए पवित्र गुफा पहुंचते हैं. पहलगाम से चंदनवाड़ी तक चार पहिया वाहन जैसे जीप, सूमो चलती हैं. इसकी दूरी करीब 17 किलोमीटर है. यही नहीं हेलिकॉप्टर की भी सुविधा उपलब्ध है.

वहीं बालटाल से डोमेल, बरारी के रास्ते अमरनाथ तक पहुंचते हैं. बालटाल का रास्ता कठिन माना जाता है लेकिन दूरियां कम है. चढ़ाई के लिए पालकी और खच्चर की भी व्यवस्था रहती है.

अब तक देशभर से करीब डेढ़ लाख श्रद्धालु 46 दिन चलने वाली इस यात्रा के लिए पंजीकरण करा चुके हैं. पिछले साल 2.85 लाख तीर्थयात्रियों ने अमरनाथ के दर्शन किए थे, जबकि 2015 में तीर्थयात्रियों की संख्या 3.52 लाख, 2016 में 3.20 लाख और 2017 में 2.60 लाख थी.

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धार्मिक मान्यताएं क्या हैं?
अमरनाथ गुफा हिंदुओं के प्रमुख तीर्थस्‍थलों में से एक है. मान्यता है कि गुफा में बर्फ का शिवलिंग है. इसलिए इसे बाबा बर्फानी भी कहते हैं. इसे ‘अमरेश्वर’ भी कहा जाता था. मान्यता है कि इसी गुफा में भगवान शिव ने अपनी पत्नी पार्वती को अमरत्व का मंत्र सुनाया था.

कैसी है सुरक्षा व्यवस्था?
आतंकवादी हमलों के खतरों को देखते हुए अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा के लिए खास इंतजाम किये जाते हैं. कई स्तरों में सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है. एक अधिकारी ने बताया कि इस बार यात्रा के लिए एक मजबूत सुरक्षा व्यवस्था की गई जिसमें उपग्रह और वाहनों/तीर्थयात्रियों की चिप आधारित निगरानी शामिल है.

सीआरपीएफ कर्मियों का एक विशेष मोटरसाइकिल दस्ता भी शामिल है जो काफिलों के साथ चल रहा है, उनके हेलमेट पर कैमरे लगे हैं. इसके साथ ही आधार शिविरों और संवेदनशील स्थलों पर सीसीटीवी कैमरे लगाये गए हैं.

यही नहीं सभी गाड़ियों में रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (आरएफआईडी) टैग लगा है जिससे वह संबंधित नियंत्रण कक्ष से जुड़े राडार से जुड़े रहेंगे और कटआफ समय के बाद ऐसे किसी भी वाहन को एक विशेष प्वाइंट से आगे नहीं जाने दिया जाएगा. सुरक्षा बलों की 300 अतिरिक्त कंपनियों हैं जो तीर्थयात्रा की सुरक्षा में तैनात हैं. एक कंपनी में करीब 120 जवान होते हैं.

अमरनाथ यात्रा की देखभाल कौन करता है?
अमरनाथ यात्रा की देखभाल अमरनाथ श्राइन बोर्ड करता है. तीर्थ यात्रियों का ब्योरा श्राइन बोर्ड के पास होता है. छोटी से छोटी सुविधाएं अमरनाथ श्राइन बोर्ड ही उपलब्ध कराती है. यात्री किसी भी तरह की ठगी का शिकार नहीं बनें, इसलिए श्राइन बोर्ड पहले से ही रुपये तय कर देता है. यही नहीं श्राइन बोर्ड यात्रियों का बीमा करता है.

मुस्लिमों की भागीदारी
हिंदूओं के इस पवित्र यात्रा में मुस्लिमों की भी बड़ी भागीदारी होती है, या यूं कहें कि इनके सहयोग के बिना यात्रा असंभव है. दरअसल, वे यात्रा को आसान बनाने के लिए हमेशा खड़े रहते हैं. इसकी एक वजह बिजनेस भी है. जिसमें चाय, पानी, ड्राय फ्रूट, बिस्किट जैसा व्यापार शामिल है. यही नहीं पालकी पर श्रद्धालुओं को ले जाने के रोजगार में स्थानीय मुस्लिमों का वर्ग शामिल है.

कल ही जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल ने कहा कि यात्रा की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है और हम उसकी देखरेख कर रहे हैं. यद्यपि पुलिस या सेना यात्रा का संचालन नहीं करती. कई वर्षों से अमरनाथ यात्रा का आयोजन कश्मीर के लोगों, विशेष तौर पर हमारे मुस्लिम भाइयों द्वारा किया जा रहा है. यात्रा उनके सहयोग से होती है. एक अनुमान और स्थानीय लोगों के मुताबिक, अमरनाथ यात्रा से करीब 20 हजार मुसलमान लाभान्वित होते हैं और उन्हें रोजगार मिलता है.


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