BSNL को नहीं बचा पाएंगी मोदी सरकार ?

गृह मंत्री अमित शाह की अगुवाई में मंत्रियों के एक समूह ने मंगलवार को मुश्किलों से जूझ रही बीएसएनएल और एमटीएनएल को पुनर्जीवित करने के उपायों पर चर्चा की.

फाइनेंसियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार बीएसएनल और एमटीएनएल को रास्ते पर लाने के सरकार के पास अब सीमित विकल्प बचे हैं. कंपनी को बचाए रखने के लिए बीएसएनएल और एमटीएनएल को सस्ते या मुफ्त 4जी स्पेक्ट्रम मुहैया कराने का विकल्प है, जिसकी वे मांग कर रहे हैं लेकिन इससे भी कंपनी का पटरी पर आना मुश्किल है.

वित्तीय वर्ष 2008 में अंतिम बार बीएसएनएल को लाभ हुआ था. तब से कंपनी को 82,000 करोड़ रुपये का का घाटा हुआ है. यह आंकड़ा दिसंबर 2018 के अंत तक 90,000 करोड़ रुपये को पार कर सकता है. रिपोर्ट के अनुसार कंपनी के राजस्व का 66 फीसदी कर्मचारियों पर खर्च होता है. जो वित्त वर्ष 06 में 21 फीसदी और वित्त वर्ष 2008 में 27 फीसदी था. पिछले कुछ महीनों से कंपनी अपने कर्मचारियों की सैलरी देने में मुश्किलों का सामना कर रही है.

जून में कर्मचारियों के वेतन के लिए कंपनी को 850 करोड़ रुपये की आवश्यकता है थी. 2004-05 से कंपनी के मोबाइल ग्राहकों की बाजार हिस्सेदारी लगभग आधी हो गई है और वर्तमान में लगभग 10% है. निजी दूरसंचार कंपनियों के लिए मजदूरी की लागत उनके राजस्व का लगभग 5% फीसदी है. वित्त वर्ष 18 में लगभग 22,700 करोड़ रुपये का परिचालन राजस्व, वित्त वर्ष 2011 के पीक लेवल से 37% कम था.

मोटे अनुमान के मुताबिक बीएसएनएल के लिए मौजूदा वार्षिक नकदी हानि रन-रेट 6,900 करोड़ रुपये से अधिक होगी. कंपनी नेटवर्क कवरेज, क्षमता और गुणवत्ता के मामले में तीन निजी ऑपरेटरों भारती एयरटेल, वोडाफोन आइडिया और रिलायंस जियो से काफी पीछे है. Jio का फ़ाइबर-आधारित ब्रॉडबैंड सेवाओं में प्रवेश भी BSNL के वायरलाइन व्यवसाय को प्रभावित करेगा, जो पिछले कुछ वर्षों से BSNL के लिए एकमात्र बढ़ता हुआ सेगमेंट था.