सेल्समैन से कैसे बना बॉलीवुड स्टार, कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता : अरशद वारसी


अरशद को जब भी जिस तरह का किरदार मिला उसे उन्होंने अपना बनाकर पर्दे पर पेश कर दिया।

सेल्समैन की नौकरी से करियर शुरू करने वाले अरशद वारसी ने हिंदी सिनेमा के चंद सबसे मशहूर किरदारों में से एक सर्किट को घर-घर तक पहुंचाया है। अरशद को जब भी जिस तरह का किरदार मिला उसे उन्होंने अपना बनाकर पर्दे पर पेश कर दिया। वह जल्द ही एक और कॉमेडी फिल्म पागलपंती में नजर आने वाले हैं।

सेल्समैन की नौकरी से लेकर एक मशहूर अभिनेता के तौर पर पहचान बनाने का सफर कैसे देखते हैं?
अच्छा लगता है। अपने बच्चों को गूगल पर मेरे बारे में खोजबीन करते देखना अच्छा लगता है। उनको ये पता होना ही चाहिए कि उनके पिता ने कहां से शुरू किया और आज कहां पहुंच गए। मैंने जीवन में कभी किसी काम को छोटा नहीं समझा और जो मिलता गया वह करता गया। हमें किसी भी काम को छोटे या बड़े की नजर से नहीं देखना चाहिए। मैं युवाओं को भी यही समझाता हूं कि काम करो, उसका लेवल मत देखो।

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किसी किरदार को अपनाने का आपका क्या सीक्रेट है?
अभिनेता के लिए जरूरी होता है कि वह हर एक किरदार को अपना ले और उस किरदार में पानी की तरह बह जाए। ये वही लोग कर सकते हैं जिन्हें किरदार की चमड़ी ओढ़ना आता है। सभी लेखक कुछ अलग सोच के साथ किरदार लिखते हैं। मैं हमेशा लेखक निर्देशक से किरदार के बारे में पूछता हूं। वह जैसा बताते हैं मैं उसे वैसा ही उतारने की कोशिश करता हूं। एक अभिनेता के तौर पर अभिनेता को वही करना चाहिए जो जो लेखक और निर्देशक ने सोचा है वह नहीं जो अभिनेता करना चाहता है।

मुन्नाभाई सीरीज की अगली फिल्म पर क्या अपडेट है, कुछ बता सकते हैं?
मैं भी अक्सर निर्देशक राज कुमार हीरानी से यही पूछता रहता हूं। उनका जवाब होता है कि वह लिख रहे हैं। मेरी जानकारी के मुताबिक वह मुन्नाभाई सीरीज की अगली सीक्वेल की दो तीन पटकथाएं लिख चुके हैं, बस क्लाइमेक्स और कहानी के अंत को लेकर अटके हैं। किसी दिन भी दिन राजू का फोन आ सकता है कि मिल गया मुझे कहानी का अंत, चलो अब शुरू करते हैं फिल्म।

अभिनेता के तौर पर आप किस तरह की कहानी की खोज में रहते हैं?
मुझे ऐसी कहानी पसंद आती है जो सुनते ही आपके दिल को छू जाए। अब चाहे वह कॉमेडी, एक्शन या फिर ड्रामा हो, फर्क नहीं पड़ता। बस कहानी आपके किसी एक जज्बात को छू ले। 

पागलपंती जैसी फिल्म का आपको इतना इंतजार क्यों रहा?
लंबे समय बाद मुझे ऐसी फिल्म मिली है जहां मुझे खुलकर कॉमेडी करने का मौका मिला है। हर निर्देशक का अपना काम करवाने का तरीका होता है। कुछ निर्देशिक स्क्रिप्ट से हटकर कुछ भी करने की गुंजाइश नहीं छोड़ते हैं लेकिन पागलपंती के निर्देशक अनीस बज्मी ने मुझे बांधकर नहीं रखा। मुन्नाभाई में मुझे ऐसा मौका मिला था जहां राजू हिरानी ने मुझे खुलकर कॉमेडी करने की छूट दी थी। 

निर्देशक अनीस बज्मी अक्सर सेट पर डायलॉग बदल देते हैं, एक अभिनेता के लिए ये कितना मुश्किल होता है?
मैं तो हमेशा दूसरे कलाकारों को यही सलाह देता हूं कि सेट पर कभी संवाद याद करके आए हीं नहीं। मैं सेट पर ही आता हूं और वहीं पढ़ता हूं और फिर बोल देता हूं। जब आप रटकर नहीं आते हैं तो कुछ नया करने की जगह होती है अगर रटकर आते हो तो थोड़ा मुश्किल होता है। 

hi_INHindi
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