भोपाल में दिसंबर की वो काली रात में हुए था बड़ा हादसा जिसमें गई थी हजारों जिदंगियां


डाओ केमिकल्स अमेरिकी कंपनी में हुए धमाके से अनेक बीमारियों से घिरे लोग आज भी उस समस्या से निजात पाने के लिए आस लगाए बैठे हुए है. इस कंपनी ने दिसंबर की वो काली रात में एक ही बार में हजारों की जिंदगियां छीन ली और जिंदा बचे लोगों को अपाहिज से ग्रस्ति कर दिया. फिर भी इस कंपनी कोई सजा नहीं दी गई और पीड़ित अपनी इस पीढ़ा को अंदर दबाए ही बैठे हैं.

आपको बता दें कि, मध्य प्रदेश की राजधानी में 35 साल पहले हुई गैस त्रासदी के पीड़ित लोग आज भी उसी समस्या से घिरे हुये है. इस हादसा को हुए पूरे साढ़े तीन दशक बीत चुके हैं. इतने दिनों में राज्य और केंद्र सरकारें बदलती रहीं. लेकिन, उस समय हादसे की चपेट में आने वाले लोगों की किस्मत अभी भी नहीं बदली है.

35 साल पहले भोपाल में गैस त्रासदी का बड़ा हादसा हो गया था. ये हादसा 2-3 दिसंबर, 1984 की दरम्यानी रात यूनियन कार्बाइड संयंत्र से रिसी जहरीली गैस ‘मिथाइल आइसो साइनाइड (मिक)’ ने हजारों लोगों को एक ही रात में मौत की नींद सुला दिया और जिसमें उसके आस-पास इलाकों में रहने वाले लोग हादसे की चपेट में आने से विकलांग हो गए. उस वक्त मौजूद लोग आज भी उस दिन को सोचकर कांप उठते हैं और उनके मन में आज भी उस त्रासदी को याद कर दहशत में जी रहे हैं.

उन सभी पीड़ितों की समस्या यहीं खत्म नहीं हुई. बल्कि दिनों दिन बढ़ती जा रही है और नई पीढ़ियों में इसका असर दिख रहा है. तो गैस पीड़ितों के लिए अस्पताल भी खोले गए हैं, मगर यहां उस तरह के इलाज की सुविधाएं नहीं हैं, जिनकी जरूरत इन बीमारों को है. गैस का शिकार बने परिवारों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी तक विकलांग पैदा हो रही है. शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग बच्चों के जन्म लेने का सिलसिला जारी है.

आईएएनएस की रिपोर्ट के मुताबिक, गैस पीड़ितों को उचित प्रकार से मदद न मिलने के कारण उनका आज भी उतना बुरा है जितना पहले था. गैस पीड़ितों को न आर्थिक मदद मिली, और न ही ठीक से स्वास्थ्य सेवाएं, इन्हें पीने के लिए साफ और शुद्ध पानी तक नसीब नहीं है. यही कारण है कि गुर्दे, फेफड़े, दिल, आंखों की बीमारी और कैंसर के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. गैस पीड़ितों की मौत हो रही है, मगर राहत देने के लिए उनका पंजीयन नहीं किया जा रहा है.

चंपा देवी शुक्ला और रशीदा बी ने चिंगारी नाम की संस्थान खोली है. जिसमें दोनों मिलकर गैस पीड़ितों की मदद कर रही है. उनकी कहना है कि, उनकी संस्थान में हर रोज 170 बच्चे आते हैं और उनका इलाज किया जाता है. इन बच्चों के इलाज के लिए फिजियो थेरेपी, स्पीच थेरेपी, विशेष शिक्षा आदि उपलब्ध कराई जाती है. इन बच्चों को चिंगारी पुनर्वास केंद्र लाने और छोड़ने के लिए वाहन की भी सुविधा की गई है साथ ही इन्हें नि:शुल्क दोपहर का भोजन भी उपलब्ध कराया जाता है.

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