जावेद अख़्तर की एक नज़्म जिसमें किया है सवाल और टिप्पणी एकसाथ


जावेद अख़्तर का देश में गीतकार के रूप में पहचाने जाते हैं ये गीतकार के साथ-साथ शायर और पटकथा लेखक भी है. जावेद अख़्तर सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी एक मशहूर हस्ती हैं. आइए जानते हैं उनके बारें में,

विरासत में मिली है शायरी
इनका जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में हुआ था. आपको बता दें कि जावेद अख़्तर एक ऐसे परिवार के सदस्य हैं जिसके ज़िक्र के बिना उर्दू साहित्य का इतिहास अधूरा रह जाएगा. शायरी तो पीढ़ियों से उनके खून में दौड़ रही है.

इस नज्म का एक शब्द मुसलसल
जावेद अख़्तर की एक नज्म जिसमें समय को लेकर ‘टिप्पणी’ और ‘सवाल’ दोनों एक साथ करते हुए नजर आ रहे हैं. जावेद साहब अपनी पहली पंक्ति ‘ये वक़्त क्या है’ में पहले सवाल करते हैं कि यह समय क्या है और दूसरी पंक्ति ‘ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है’ में टिप्पणी करतें हैं कि यह क्या है जो लगातार गुजर रहा है. यहां मुसलसल का अर्थ ‘लगातार’ शब्द से है. इस नज्म में जावेद अख़्तर समय के फेर को समझाने की कोशिश करते हैं. वह समझाना चाहते हैं कि समय किसी के लिए नहीं रुकता. वह गुजरता चला जाता है.

जावेद अख़्तर की मशहूर नज़्म
ये वक़्त क्या है ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है
ये जब न गुज़रा था
तब कहां था
कहीं तो होगा
गुज़र गया है
तो अब कहां है
कहीं तो होगा
कहाँ से आया किधर गया है
ये कब से कब तक का सिलसिला है
ये वक़्त क्या है

hi_INHindi
hi_INHindi
Share via
Copy link
Powered by Social Snap