माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले क्यों नहीं आ पाते हैं कभी वापस


करीब 20 फुट से भी ज्यादा ऊंचाई वाला स्थान जहां का तापमान शरीर को जमा दें. ऐसी जगह पर अगर बर्फीला तूफान आ जाए तो किसी की भी हिम्मत न हो बचाने की.

आपको बता दें कि ऐसे ही बर्फीले तूफान की वजह से देश की रक्षा कर रहे जवान खुद उस बर्फीलें तूफान की चपेट में आकर हमेशा के लिए उस बर्फ में दफन हो जाते हैं. लेकिन हम यहां आप लोगों को बताने जा रहे हैं दुनिया का सबसे ऊंचा खतरनाक रास्तों वाला और सबसे ज्यादा ठंड़ा ,पहाड़ माउंट एवरेस्ट के बारें में. बताया गया है कि यहां पर पड़ी लाशें आज भी भटके इंसान को रास्ता बताती है.

कई सवालों में छिपे हैं जवाब
आखिर ये जगह कौन सी है, जहां लाशों को मील का पत्थर बना दिया जाता है. और उन्हें दो गज़ ज़मीन भी उपलब्ध नहीं होती. लाशों को माइल स्टोन क्यों बोला जाता. लाश के खराब न होने के पीछे की क्या है वजह. एक साथ है कई सवाल . इन सवालों के जवाब भी उस एवरेस्ट पर मिलेंगे जहां पर दफन है अलग-अलग जगहों पर बिखरी कई लाशें.

लाशें भटके हुए लोगों की करती है मदद क्या है सच
ज़मीन ऐसी बंजर और दर्रे इतने ऊंचे कि यहां तक पहुंचना ज़िंदगी का मक़सद तो हो सकता है. मगर मजबूरी नहीं. क्योंकि यहां मौत ज़िंदगी पर भारी पड़ जाती है. ये एवरेस्ट है दुनिया का सबसे ऊंचा, सबसे ठंडा और सबसे खतरनाक पहाड़. हर साल इसे फतह करने का मिशन बनाकर यहां करीब तीन-साढे तीन सौ लोग आते हैं. कुछ कामयाब होते हैं और कुछ नाकामयाब होकर यहीं इसी बर्फ में दफन हो जाते हैं. मगर ये मर कर भी मरते नहीं हैं. ये अपनी गलतियों से दूसरों को सबक देते हैं कि जिस रास्ते पर उन्हें मौत मिली. उस पर जाना मना है. और कभी कभी उनकी लाशें यहां आने वाले पर्वतारोहियों के लिए गूगल मैप का भी काम करती हैं.

मौत की क्या रही वजहें
एवरेस्ट के पर्वत पर इस वक्त 308 से ज्यादा माइल स्टोन यानी लाशें गड़ी हुई हैं. जिन्हें देखकर यहां आने वाले पर्वतारोही अपनी मंज़िल तय करते हैं. ये लोग कौन हैं इनका खुलासा करेंगे. मगर उससे पहले ये जानना ज़रूरी है कि एवरेस्ट पर इंसान से मील का पत्थर बन चुके ये लोग आखिर मरे कैसे. एक आंकड़े के मुताबिक सबसे ज़्यादा मौत यहां पैर फिसल कर गिरने की वजह से हुईं. और उसके बाद ठंड की वजह से दिमाग सुन्न हो जाने पर लोगों की सांसे थम गईं.

एवरेस्ट से लाशों को क्यों नहीं लाया जाता है वापस
सरकारों ने अब तक इन लाशों को उनके अपनों तक पहुंचाने की कोशिश भी नहीं की. क्योंकि यहां इस बर्फीली चोटी से लाशों को नीचे ज़मीन पर लाना ना सिर्फ नामुमकिन सा है. बल्कि अंदाज़े से ज़्यादा खर्चीला भी है. लिहाज़ा एवरेस्ट की इंतेज़ामिया कमेटी इन लाशों को यहीं छोड़ देती है. एक अनुमान के मुताबिक अगर एवरेस्ट पर पड़ी 308 लाशों में से किसी एक लाश को भी उतारा जाए. तो ना सिर्फ 30 लाख रुपयों का खर्च आएगा बल्कि उसे उतारने के लिए जो लोग इन बर्फीली चोटियों पर चढ़ेंगे उनकी जान जाने का भी खतरा होगा.

कुदरत से टकराने को उठाते हैं ज़हमत
माइनस 16 से माइनस 40 डिग्री का ये वो तापमान है, जहां हम और आप जाने का कल्पना भी नहीं कर सकते. वहां ये पर्वतारोही इन खड़ी पहाड़ियों पर चढ़ने की ज़िद करते हैं. जो तकरीबन खुदकुशी करने के बराबर है. कुछ एक हद तक जाकर लौट आते हैं. तो कुछ आगे जाने की ज़िद में अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं. और ये 308 लाशें उन्हीं लोगों की हैं. जिन्होंने कुदरत के कहर से लड़ने की ज़िद की. मरने वालों में कई तो ऐसे हैं जिन्होंने एवरेस्ट की चोटी को फतह तो कर लिया. मगर उनकी मौत इस बर्फीली पहाड़ी से उतरते वक्त हुई.

एवरेस्ट पर कुछ लाशों की पहचान होती है नाम से
एवरेस्ट की इस पहाड़ी पर दो तरफ से चढ़ाई की जाती है. और इन दोनों तरफ अलग अलग दूरी पर पर्वतारोहियों की लाशें सालों से पड़ी हैं. इन लाशों के कोई नाम नहीं है. बस इनके कपड़ों और जूते रास्ता बताने वाले पहचान चिन्ह बन गए हैं. ये लाश ग्रीन बूट के नाम से जानी जाती है. जो एवरेस्ट के उत्तर-पूर्वी रास्ते पर है. जो भारतीय पर्वतारोही शेवांग पलजोर की है. जो साल 1996 में एवरेस्ट पर चढ़ाई करते हुए बर्फीले तूफान में फंस कर मारे गए थे. आज तक शेवांग की लाश वहीं पड़ी है और ग्रीन बूट के नाम से जानी जाती है. शेवांग की तरह कई और लाशें भी इन्हीं रास्तों पर हैं. जिन्हें नाम से नहीं बल्कि उनके कपड़ों या जूतों से पहचाना जाता है.

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