देश के विभिन्न इलाकों में चल रहा मानव तस्करी का खेल, महिलाओं का हो रहा है असुरक्षित पलायन


बड़ा शहर हो या छोटा कहीं न कहीं मानव तस्करी का खेल चलता ही रहता है. और बेचारी महिलाएं छोटी-छोटी बच्चियां इस तस्करी का हिस्सा बनती चली जाती है.

जी हाँ, और तो और पता नहीं कब तक ये इस चंगुल में फंसी रहती है शायद कोई तो अपनी पूरी जिंदगी ही बिता देती है तो कुछ आधी जिंदगी ही बिताकर दम तोड़ देती है. इतने ज्यादा संघर्ष करने के बाद भी एक के बाद एक बच्चियां इस गंदे खेल का शिकार होती जा रही है और देश के बाकी बेपरवाह लोग अपनी मौज भरी जिंदगी जीते जा रहे है, और लगता है सरकार को इस मामले में दूर-दूर तक या तो कोई जानकारी नहीं है या नजरअंदाज कर रही है. आइए जानते है आगे मानव तस्करी के बारें में….

महिलाओं का हो रहा पलायन
मानव तस्करी आज भी झारखंड के लिए नासूर बनी है. झारखंड की इस विडंबना पर काम कर रही संस्थाओं की रिपोर्ट पर गौर करें तो राज्य के विभिन्न हिस्सों से हर साल तकरीबन 10 हजार महिलाओं का आज भी असुरक्षित पलायन हो रहा है. इनमें से लगभग 10 फीसद दोबारा अपने गांव नहीं लौट पातीं. या यूं कहें कि उनका कुछ अता-पता नहीं चलता. शेष किसी न किसी रूप में शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना की शिकार होती हैं.

एटसेक के आंकड़े
भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका तथा पाकिस्तान स्थित अपने कार्यालयों से 47 सहयोगी संस्थाओं के माध्यम से इस क्षेत्र में कार्यरत एक्शन अगेंस्ट ट्रैफिकिंग एंड सेक्सुअल एक्सप्लॉयटेशन (एटसेक) के आंकड़े इसे पुष्ट करते हैं. रिपोर्ट बताती है, यह पलायन नौ फीसद बिचौलिये के बहकावे में, तीन फीसद पारिवारिक दबाव में, 37 फीसद सहेलियों के साथ, शेष 51 फीसद परिवार के अन्य सदस्यों के साथ हो रहा है.

दिल्ली है खरीद बिक्री की सबसे बड़ी मंडी
बिचौलिए उन्हें उज्जवल भविष्य के सपने दिखाकर ले तो जाते हैं, परंतु उसे उसकी किस्मत पर छोड़कर निकल जाते हैं। पलायन करने वाली नाबालिग और किशोरियों में से 67 फीसद की आयु 20 वर्ष से कम होती है. दिल्ली किशोर-किशोरियों की खरीद-बिक्री की सबसे बड़ी मंडी है. इसके अलावा मुंबई, यूपी, कोलकाता, ओडिशा आदि राज्यों में भी इनकी बोली लगती है. राज्य गठन के 19 वर्ष बाद भी मानव तस्करी और असुरक्षित पलायन के ग्राफ में कमी नहीं आना घोर चिंता का विषय है. यह कहीं न कहीं मानव तस्करी की रोकथाम के लिए स्थापित तंत्र और सरकार के डिलीवरी मैकेनिज्म पर सवाल खड़ा करता है.

आवश्यकता है कि मानव तस्करी के कारणों की ईमानदारीपूर्वक तलाश और उसके निदान की. इसमें सरकारी तंत्र ही नहीं, पंचायती राज संस्थाओं और सामाजिक संगठनों समेत समाज के हर तबके को जवाबदेही निभानी होगी.

सीआईडी रख रहा है कड़ी नजर
मानव तस्करी की घटनाओं को रोकने और तत्काल कार्रवाई के लिए झारखंड के आदिवासी बहुल आठ जिले-रांची, खूंटी, गुमला, लोहरदगा, सिमडेगा, चाईबासा, दुमका के अलावा पलामू में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) स्थापित किए गए हैं. इनके इलावा अपराध अनुसंधान विभाग (सीआइडी) भी इन मामलों पर नजर रखता है. फिर भी कई कुख्यात तस्कर पुलिस की पकड़ से बाहर हैं और खूंटी, गुमला, सिमडेगा, चाईबासा, रांची जैसे इलाकों से बड़ी तादाद में लड़कियों को वे महानगरों में ले जाने में सफल हो रहे हैं।

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