परंपरा को तोड़ हमलावरों के खिलाफ एक्शन ले सकती है पुलिस


जेएनयू में हुई हिंसा के समय पुलिस बाहर खड़े होकर तमाशा देखती रही लेकिन नहीं आई बचाने. ये आरोप है जेएनयू के हिंसा का शिकार बने छात्रों का. घायल हुए छात्रों ने मीडिया के सामने अपना दर्द बयां किया.

अब परंपरा को बदले पुलिस
प्रकाश सिंह ने कहा, ”इस परंपरा को तोड़ना होगा. आजकल के लड़के पिस्तौल, छुरी लेकर, बम लेकर कैंपस में घूमते हैं. अगर पुलिस को किसी तरह की हिंसा की सूचना मिलती है तो उसे कैंपस में जाकर एक्शन लेना चाहिए. ऐसी स्थिति बनने पर किसी वाइस चांसलर की अनुमति मिलने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए लेकिन यह समाज को भी स्वीकार करना होगा.

समाज अपने हिसाब से चीज़ें देखता है. जहां सुलभ लगता है वहां कहते हैं जाना चाहिए, जहां सुलभ नहीं लगता वहां कहते हैं नहीं जाना चाहिए. शैक्षणिक संस्थानों को लेकर जो धारणा बनी है कि पुलिस बिना अनुमति के ना घुसे, उसे बदलने की ज़रूरत है. आजकल तमाम कैंपस में जिस तरह की आपराधिक घटनाएं हो रही हैं, ऐसे में आप रोज़-रोज़ अनुमित मांगते रहेंगे तो किसी दिन कैंपस के अंदर हत्या भी हो जाएगी तो भी पुलिस अनुमति मिलने का इंतज़ार करती रहेगी.”

पुलिस ने मामूली झगड़ा बताकर किया अपना बचाव
दिल्ली पुलिस के पीआरओ एमएस रंधावा के मुताबिक़, रविवार को पांच बजे आसपास दिल्ली पुलिस को एक फ़ोन कॉल आया जिसमें बताया गया कि जेएनयू में दो गुटों के बीच आपस में झगड़ा हुआ है. इसके पहले भी ऐसे झगड़े की बातें सामने आई थीं.

प्रशासन ने बुलाया पौने आठ बजे
कैंपस के अंदर दिल्ली पुलिस को जाने की अनुमति नहीं है लेकिन कोर्ट के आदेशानुसार सिर्फ एडमिनिस्ट्रेशन ब्लॉक में तैनाती हो सकती है. जहां हिंसा हुई वो जगह थोड़ी दूर है. दिल्ली पुलिस को जेएनयू प्रशासन ने शाम में पौने आठ बजे कैंपस में आने के लिए कहा. जिसके बाद पुलिस ने फ़्लैग मार्च किया.

जेएनयू के आसपास भी नहीं दिखी पुलिस
दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह के मुताबिक़, ”पुलिस का तर्क है कि कैंपस में जाने की इजाज़त काफ़ी देर बाद मिली और अंदर पहुंचने में देरी हुई. आपको बता दें कि आज की तारीख़ में जेएनयू बेहद संवेदनशील जगह है, पुलिस की उपस्थिति आसपास होनी चाहिए थी. अगर आप कैंपस में नहीं थे तो आसपास क्यों नहीं थे?’

hi_INHindi
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