जानिए, खुद की जिम्मेदारी उठाने के बावजूद भी कैसा जीवनसाथी चाहती है महिलाएं


महिलाएं प्राय: हर तरीक़े से पुरुषों जैसी ही होती हैं. पर फिर भी वो ऐसा साथी चाहती हैं, जो उनकी सामाजिक और आर्थिक ज़िम्मेदारी उठा सके, यह हकीकत सामने आई है अमेरिका की टेनेसी यूनिवर्सिटी में हुए एक अध्ययन में. आइए, जानते हैं, इसमें कितनी सच्चाई है.

पुरुषों के प्रति रहती है असंतोष
संपन्न घरानों के व्यक्तियों में से तक़रीबन 25 फ़ीसदी ऐसी महिलाएं हैं जिनकी उम्र 25-30 वर्ष है और उनकी आमदनी लगभग रु1.25 लाख प्रतिमाह है. वे लिव-इन रिश्तों में रह रही हैं. उन्होंने करियर में अपना मुक़ाम ख़ुद पाया है और वे अपने जीवन की लगभग हर महत्वाकांक्षा को पूरा करने में सक्षम हैं. उन्हें ये अच्छी तरह पता है कि उन्हें अपनी आर्थिक ज़िम्मेदारी उठाने के लिए किसी साथी की ज़रूरत नहीं है. लेकिन पिछली पीढ़ियों का जायज़ा लिया जाए तो महिलाओं में पुरुषों के प्रति असंतोष रहा है, ख़ासतौर पर उनकी विश्वसनीयता को लेकर. अत: धीरे-धीरे अवचेतन अवस्था में महिलाएं अपनी बायोलॉजिकल परिस्थतियों से उबरकर अपनी ज़रूरतों का ख़्याल रखने में सक्षम हो रही हैं.’’

जीवनसाथी मिलें, खुद से ज्यादा परिपक्व
हर महिलाएं अपनी ज़िंदगी की दिशा ख़ुद तय करना चाहती हैं. वह चाहती है कि जिस पुरुष से विवाह करूं, वो मुझसे जुड़ी हर ज़िम्मेदारी उठा सके. भले ही मैं कितना भी क्यों न कमाऊं. ये भी चाहती है कि जिस पुरुष को जीवनसाथी के रूप में चुनू वो मुझसे कहीं ज़्यादा परिपक्व हो और मेरी देखभाल करने में पूरी तरह सक्षम हो. वो चाहेंगी कि जब वह अपने जीवन में किसी चुनौती का सामना करें तो वो उनका मार्गदर्शन कर सके.

कामकाजी महिलाएं
‘‘बायलॉजिकली, महिलाएं जन्म से ही देखभाल करने के लिए होती हैं, किसी तरह की आपूर्तिकर्ता या ज़िम्मेदारी उठानेवाली नहीं. आजकल विश्वभर की महिलाएं बहुत-सी ऐसी ज़िम्मेदारियां उठा रही हैं, जो पिछली पीढ़ियों की महिलाओं ने नहीं उठाई थीं. लेकिन आज की कामकाजी महिलाएं, करियर के लिए संजीदा महिलाओं की पहली पीढ़ी की महिलाएं हैं.

आसान लगता है आपूर्तिकर्त्ता बनना
जब काम और घर के बीच संतुलन की बात आती है तो उनके सामने कोई ऐसा रोल मॉडल मौजूद नहीं है, जिससे वे सीख ले सकें. अत: उन्हें परिवार में पति के साथ-साथ घर का दूसरा आपूर्तिकर्ता बनना आसान लगता है. चूंकि अब उन्होंने करियर बनाना और कमाना शुरू कर दिया है, इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिए कि उन्हें अपने साथी से उनकी आर्थिक ज़िम्मेदारी उठाने की उम्मीद नहीं होगी. सदियों से कई समाजों में ये अबोला, अनकहा नियम-सा चला आ रहा है कि महिलाओं को ऐसा साथी चुनना चाहिए, जो उनसे आर्थिक, सामाजिक व बौद्घिक रूप से बेहतर या फिर उनके समकक्ष हो।

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